Kuch Alfaaz

रौशनी रौशनी रौशनी हर तरफ़ रौशनी से कहो छोड़ जाए मुझे वक़्त का कारवाँ जा रहा है मगर अभी साथ ले कर न जाए मुझे मिरी आरज़ू है कि तू भी कभी दिल की जानिब वो रस्ता सुझाए मुझे मिरी रौशनी को मिरे नूर को मेरी आँखों से ले कर दिखाए मुझे ज़ुल्मत-ओ-मौत की वादियों में कभी अँधेरों की ख़ातिर लुटाए मुझे रात का दूसरा रुख़ जो देखा नहीं चाँद की दूसरी सम्त भी है तिरी कभी उस से भी तो मिलाए मुझे ज़िंदगी ज़िंदगी ज़िंदगी हर तरफ़ ज़िंदगी से कहो छोड़ जाए मुझे

Ghalib Ahmad
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