Kuch Alfaaz

तुम्हारी जानिब दुआ के मोती रवाना करते दिखा ये सकते कि लाडली की सुनहरी आँखें भरी हुई थीं वो एक चिट्ठी कि जिस में ख़ुद को दिलासा देते बिलक रही थी वो बिखरे सफ़्हात डाइरी के कि जिन में तुम पर लिखी थीं नज़्में भरे थे अश'आर कैसे भेजें कि तुम तो मिट्टी के घर में जा के बसे हुए हो ज़मीन वालों को आ के देखो कि बिन तुम्हारे हमारी ईदें भी मातमों की तरह गुज़रती हैं बैन करते उदासियों की सियाह भट्टी में जलते बुझते कि आसमानी बशारतों का जो सिलसिला था वो एक मुद्दत से तोड़ रक्खा है जोड़ डालो तुम्हारे ख़्वाबों की मुंतज़िर है तुम्हारी लाडो सो इस से पहले सफ़र के अस्बाब बाँध ले वो समाअतों को सदा सुना दो

Rabia Basri
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