Kuch Alfaaz

"बचपन" मैं जब छोटा था मैं ने चलना ना सीखा था मेरी हर बात सच्ची थी मेरा हर लफ्ज़ माँ था मेरा बिस्तर बाप का कांधा था मेरा साथी भाई था जो घर का आँगन था वो मेरी दुनिया था जो माँ के कदम थे वो मेरी जन्नत थे अब होश जब सँभाला है याद फिर वही सब आया है कितने अच्छे थे साथ थे दिल में उन्हे खोने का मलाल आया है माज़ी के वर्क़ो पर इत्र का साया है मेरी आँखों मैं वही मंज़र पुराना है मौका मिले किस्मत से तो वही बचपन दोहराना है

ALI ZUHRI
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