"बचपन " आता है याद हम को गुज़रा हुआ ज़माना आँगन में खिड़कियों पर चिड़ियों का चहचहाना बरसात का महीना कागज की कश्तियाँ और फूलों की डालियों से वो तितलियाँ उड़ाना जंगल की सैर करते हम रोज़ सुब्ह उठकर अपना तो क़ा'इदा था सूरज को है जगाना पापा के पालने में बसती थी अपनी दुनिया मम्मी की गोद में था छोटा सा आशियाना खेतों को जब भी जाते पापा के साथ में तो पेशा ही बन गया था पैरों से धूल उड़ाना सुनते थे जब कहानी रातों को दादी माँ से ज़िद कर के फिर से कहते एक और भी सुनाना बचपन का दौर तो बस मस्ती से कट रहा था तितली की आरज़ू थी कलियों सा मुस्कुराना छूने की चाँद को हम कोशिश हज़ार करते और ये भी जानते थे मुश्किल है इस को पाना अंदाज़ उस समय में ख़ालिक़ से कम नहीं था बचपन से ही था अपना जन्नत में आना जाना रोते बहुत हैं अब तो वो दौर याद कर के अश्कों की आस्ताँ ही हँसने का था ठिकाना
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