“बचपन का ज़माना “ बचपन के ज़माने को मैं भूल न पाऊँगा बचपन का दिवाना हूँ हर बार बताऊँगा मैं माँ का दुलारा था पापा का सितारा था हर ख़्वाब मुकम्मल था बचपन के ज़माने में कूदा हूँ मैं पेड़ों से पत्तों से बनाई नाव तैरा हूँ मैं दरिया में बचपन के ज़माने में गाँव की हो पगडंडी या शहर की वो सड़कें सब रस्तों को मापा है बचपन के ज़माने में ना धूप ने रोका था ना धूल ने रोका था घूमा हूँ मैं पूरे दिन बचपन के ज़माने में माटी के खिलोनों से खेला था कभी मैं तो माटी थी बड़ी प्यारी बचपन के ज़माने में हिन्दू न कोई मुस्लिम सब एक थे बचपन में ज्ञानी थे बड़ो से हम बचपन के ज़माने में लिखना भी न आता था पढ़ना भी न आता था बस खेल ही खेला था बचपन के ज़माने में चप्पल को बिना पहने दौड़ा हूँ ज़माने में मापा है मुहल्ले को बचपन के ज़माने में बचपन के ज़माने को मैं भूल न पाऊँगा बचपन का दिवाना हूँ हर बार बताऊँगा दुनिया से निराला था बचपन जो हमारा था हर चीज़ से प्यारा था बचपन जो हमारा था ख़्वाहिश भी मुकम्मल थी हर ख़्वाब हमारा था कितना वो निराला था बचपन जो हमारा था मासूम वो आँखें थी बातों में रवानी थी क्यूँँ याद बहुत आया बचपन जो हमारा था पैसे जो चुराते थे फिर माँ से छिपाते थे पापा ने सुधारा था बचपन जो हमारा था बचपन के ज़माने को मैं भूल न पाऊँगा बचपन का दिवाना हूँ हर बार बताऊँगा मिट्टी से बनाए घर दरिया के किनारे पर ये बात हमारी है बचपन के ज़माने की आँखों में भरी उमँगे चेहरे पे सजाया नूर ये याद निराली है बचपन के ज़माने की दरिया के किनारे पर घूमा था सबेरे तक तब याद मुझे आई बचपन के ज़माने की दुश्मन से मोहब्बत थी हर शख़्स हमारा था ये बात पुरानी है बचपन के ज़माने की बचपन के ज़माने को मैं भूल न पाऊँगा बचपन का दिवाना हूँ हर बार बताऊँगा
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