बचपन से जवानी तक जीवन आवारा-गर्दी में अच्छा-ख़ासा काट रहा था मेरे दोस्त रिआया थे और मैं उन का सम्राट रहा था मुक्के-बाज़ी ताश कबड्डी आँख-मिचौली छुपन-छुपाई कंचे कैरम गिल्ली-डंडा लूडो और पकड़म-पकड़ाई और बहुत से खेल रहे हैं जो सब ने ही खेले होंगे लेकिन अब मुझ जैसों का क्या सोचो कितने अकेले होंगे बचपन जैसे-जैसे बीता हो गई एक तरफ़ चंचलता एक तरफ़ घर का ज़िम्मा है एक तरफ़ इफ़लास है खलता जब से होश सँभाला मैं ने इतना बचपन याद है केवल बचपन सुंदर बाग़ीचा था और यौवन बर्बाद है केवल बचपन जल्दी गुज़रेगा तो दौलत ख़ूब कमाऊँगा मैं प्यार मोहब्बत बाँटूँगा और अपना जहाँ बनाऊँगा मैं मेरी इसी ग़लत-फ़हमी में एक ज़माना गुज़र गया है मेरे ख़्वाबों का आशियाना काँच के जैसा बिखर गया है इस फ़ानी दुनिया की हक़ीक़त जान के दिल मेरा डर गया है मुझ में जो इक बच्चा था ना जवान होते ही मर गया है
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