Kuch Alfaaz

"बदल देते था जो लिखा हुआ" मैं ख़ुद शिकस्त खाया प्यार में औरों को जीतने के मशवरे क्या करूँं उस पर इतना मर के ना उसे पा सका उस के लिए फिर मर के क्या करूँं जिस कदर रूह को तू ने था मेरी छुआं महक जाता था गया मुझ से जो छुआ गीली जलती लकड़ी से जैसे है उठता वैसे अब बस रह गया उठता सा धुआँ रखें सलामत ख़ुदा तुझे अब मेरी "जाँ" मेरी जान तेरे जानें से तो जाती जा रही तू ढूँढ़ने भी फिर निकले मुझे उस तरह मैं जैसे मिला था वैसे मिलूंगा कैसे फिर कही वो कहता रहा जो हुआ, नियति में था जो लिखा हुआ मैं कहता साथ होता तेरा, बदल देते था जो लिखा हुआ

Kohar
WhatsAppXTelegram
Create Image