"फ़िक्र-ए-दुनिया" बदलता वक़्त है लोग इंसानियत को ख़्वार समझ लेते हैं हर नेक इंसान को मुजरिम-ए-पुख़्ता-कार समझ लेते हैं गुलों को सींचने वाले शख़्स को सज़ा देने का बहाना ढूँढ़े उस की नेक-निय्यती को उस का कारोबार समझ लेते हैं किसी की मासूमियत से उस को क़ुसूरवार समझ लेते हैं ये दुनिया वाले हैं ये तो हर चीज़ को बाज़ार समझ लेते हैं इन की निगाह में मासूम मुआ'फ़ी का भी हक़दार नहीं कोई कैसी गर्दिश है जहाँ में हर रिश्ते को व्यापार समझ लेते हैं साफ़-गो शख़्स बात कहे तो उसे फ़रेब-कार समझ लेते हैं दिल के मंदिर के तराने को धोके की झंकार समझ लेते हैं बे-मुरव्वत आलम समझे ही नहीं पाक-ओ-साफ़ रिश्तों को दर्द-मंदी में जान देने वाले को भी तबाह-कार समझ लेते हैं फ़िक्र होती है लोग अपनी मर्ज़ी के अनुसार समझ लेते हैं बे-रहम दिल वाले किसी को भी गुनाहगार समझ लेते हैं इक रहम दिल फ़रिश्ते ने ये समझाया था ये मुझे दिल से वो ही मेरी मासूम कोशिश से मुझे ख़तावार समझ लेते हैं
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