Kuch Alfaaz

रात फिर यूँँ हुआ अध खुले आसमाँ पर परिंदों की चीख़ों में लिपटे हुए ख़्वाहिशों के बदन तिलमिलाने लगे मेरे कानों में मेरे दहकते हुए ख़ून की रंग की नूर की सीटियाँ सी बजीं फिर इरादों की छाती में नीली रगें मुंजमिद हो गईं फिर बदन की फ़सीलों के साए बने जुम्बिशों में वही सरसराहट हुई फिर मिरे जिस्म की दूधिया चाँदनी हर तरफ़ छा गई और मैं जिस्म-ओ-जाँ की शिकन-दर-शिकन उलझनों को समेटे हुए सो गया रात फिर यूँँ हुआ

Yusuf Kamran
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