नौहे लिखते लिखते ये दिल थक जाता है बिखरे हुए हैं सब दिल वाले हम मतवाले तन्हा हैं रौशनियों के बेटे तारीकी में आ कर चमकें हम राहों में तय्यार मिलेंगे जो यलग़ार यहाँ भी होगी हम अपने ख़ूँ के फ़व्वारों को आम करेंगे एक चराग़ाँ कूचा-ए-रुस्वाई में इक बाला-ए-बाम करेंगे उन रोज़ों में ये दिल थक कर सो भी चुके तो हम ख़ुश होंगे बादल के तकिए पे बहुत आराम करेंगे
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