Kuch Alfaaz

बंदगी तमाम दुनिया ख़ुदा के पीछे चलो कि हम भी यही करेंगे किसी का होना किसी की ख़ातिर किसी की ख़ातिर जिए मरेंगे तमाम नक़्शे बग़ैर पूछे मिटा दिए हैं हवा ने उन के न मिलने आए न आँसू पोंछे बड़े अजब हैं दिवाने उन के ख़बर नहीं कितनी मुद्दतों तक तेरी तमन्ना तेरी तलब थी सँभाले रक्खा हमीं ने ख़ुद को बहार-ए-रुत दस्तयाब कब थी उसी के पैरों में पड़ गए हैं वही मसीहा वही सहारा पड़ी ज़रूरत जब उस की हम को उसी को दिल ने बहुत पुकारा खिले खिले फूल इक चमन में बुझा बुझा रंग बंदगी का इसी में 'उम्रें गुज़ारी हम ने गुमाँ हुआ एक ज़िंदगी का

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