Kuch Alfaaz

वो एक पुल था मिरे और अज्दाद के ज़मानों का नुक़्ता-ए-इत्तिसाल उस की गुज़रगाहों से रिवायतों और हिकायतों के हज़ार-हा क़ाफ़िले निकल कर नए ज़माने की यूरिशों से मिरी बिखरती अना में उल्फ़त यक़ीन और ए'तिमाद के रंग भर गए हैं वो एक पुल आज टूट कर गहरी घाटियों में गिरा है अब मैं खड़ा हूँ उन गहरी घाटियों पर मैं एक पुल हूँ वो एक बरगद था जिस की छाँव में एक ठंडी मिठास थी जिस ने जलते सूरज की हिद्दतें अपने जिस्म में जज़्ब कर के उस की सुनहरी किरनों को ठंडी शबनम की तरह मेरी उजाड़ आँखों में क़तरा क़तरा उतारा वो आज हिद्दतों के वफ़ूर से जल गया तो अब मैं ही एक बरगद हूँ आने वालों के वास्ते एक ठंडी छाँव वो एक जव्वाला था वो भरपूर ज़ीस्त करने की एक सीमाबी आरज़ू वो लहू की धड़कन जो रात की ज़ुल्मतों पे शब-ख़ून मार कर रौशनी और उम्मीद के दरीचों को खोलता आज शब का सफ़्फ़ाक हाथ उस के लहू की धड़कन को ले उड़ा और अब फ़क़त मैं हूँ रात की ज़ुल्मतों से पंजा-फ़गन

Ejaz Farooqi
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