Kuch Alfaaz

यहीं तो कहीं पर तुम्हारे लबों ने मिरे सर्द होंटों से बर्फ़ीले ज़र्रे चुने थे उसी पेड़ की छाल पर हाथ रख कर हम इक दिन खड़े थे यहीं बर्फ़-बारी में हम लड़खड़ाते हुए जा रहे थे बहक ताज़ा बोसों की सर में समाए हम-आग़ोशी जिस्म-ओ-जाँ के नशे में गई बर्फ़-बारी की रुत और पिघलती हुई बर्फ़ भी बह गई सब यहाँ कुछ नहीं अब कि हर शय नई है हटा कर रिदा बर्फ़ की घास लहरा रही है हरी पत्तियों की घनी टहनियों में हवा जब चले तो गए मौसमों से गुज़रती हमारी हँसी गूँजती है

Fahmida Riaz
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