गए वक़्तों में मोहब्बत दिल पे लिखी अनमिट तहरीर होती थी सुना है पत्थर पर लकीर होती थी मगर अब हाथ में था में किसी बर्क़ी आले के बटनों में उलझी है उँगली और अंगूठे पर ब-वक़्त-ए-ज़रूरत थिरकती रहती है बर्क़ी पैग़ामात के ख़ाने में पड़े चंद बे-लिबास फ़िक़रे मोहब्बत की अलामत बन गए हैं किसी पुराने दौर में मोहब्बत दिल से निकालना एक जोखिम था मगर अब सुना है कि इस के लिए डिलीट के कई ऑपशन ईजाद हो चुके हैं रात के चोर अँधेरे में कोई रौशन स्क्रीन पर अपने लम्स से लिखता है तुम्हें छू लूँ बस अब मोहब्बत राब्ते की इस सदी में आख़िरी साँसों के दरमियान एक हिचकी पे अटकी हुई है कि अब मोहब्बत महसूस करने से ज़ियादा छू लेने की कोशिश है
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