Kuch Alfaaz

गए ज़मानों से तीरगी में भटकने वालो सितम की लंबी सियाह रात अब गुज़रने वाली है और मशरिक़ से रथ में बैठा हुआ वो पैकर कि जिस की आमद के तुम हमेशा से मुंतज़िर थे कि जिस की आमद के ख़्वाब बन बन के रात आँखों में काटते थे सुनहरी किरनों का ताज पहने निकलने वाला है तुलू-ए-फ़र्दा की आस में तीरगी की राहों पे चलने वालो तुम्हें बशारत हो तीरगी ख़त्म हो रही है तुलू-ए-फ़र्दा क़रीब-तर है तुलू-ए-फ़र्दा क़रीब-तर है

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