बे-आबाद घरों में ऐसा होता है दूर के देस को जाने वाला कोल्हू का एक बैल बना है हर पहली को हरकारे के हाथ में एक मनी-ऑर्डर का रस्ता तकती बाप की आँखें ख़ुशी ख़ुशी तस्बीह के दाने जल्दी जल्दी फेर रही हैं बहनें डॉलर के तावीज़ बना कर गले में डाले घूम रही हैं भाई अपने यारों में परदेस के क़िस्से रंग-बिरंगी आवाज़ों में हाँक रहे हैं ख़ुश-फ़हमी की मारी बीवी अपनी जवानी उम्र के कैलन्डर में रख कर कामों में लग जाती है माँ दीवार पे बैठे कव्वे की आवाज़ को सुन कर ख़ुश होती है दूर के देस में कोल्हू का वो बैल बेचारा रात को थक कर सो जाता है बे-आबाद घरों में अक्सर ऐसा हो जाता है
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