Kuch Alfaaz

मरियम ने ख़्वाब देखा जंगल में है वो तन्हा इतने में झाड़ियों से इक शे'र झट से निकला देखी जो शक्ल उस की मरियम पे ख़ौफ़ छाया बेचारी जी में सहमी अब शे'र मुझ पे झपटा पर शे'र का तो उस दम कुछ और ही था नक़्शा था वो बहुत परेशाँ सहमा सा और डरा सा लटकी हुई थी गर्दन उतरा हुआ था चेहरा आँखों में उस की आँसू जो दुम से पोंछता था मरियम को देख कर ये बेहद हुआ अचम्भा ढारस बंधी जो उस की मरियम ने उस से पूछा ऐ बादशह सलामत है हाल आप का क्या तब उस ने झुरझुरी ली मरियम की सम्त पल्टा पहले दिखाए पंजे खोला फिर अपना जबड़ा कुछ देर चुप रहा वो फिर आह भर के बोला क्या पूछती हो मुझ से ऐ मेरी नन्ही गुड़िया बिगड़ा मिरा मुक़द्दर फूटा मिरा नसीबा या बद-दुआ' है उस की मैं ने जिसे सताया मुझ में रहे न कुछ गुन अब दाँत हैं न नाख़ुन

Ghulam Abbas
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