Kuch Alfaaz

बे-ईमान आज़ादी जब देखता मैं आसमाँ में, तो लगे मुझ को कभी मैं तिश्नगी हूँ और हूँ शायद किसी की अज़्म मैं मेरे तरह के लोग हो ना-शाद लेते जानकर दिन-रात ये सब कुछ ग़लत ही सोचने आज़ाद हूँ उड़ते दिखाई दे कई सारे परिंदे देखु जब ये ज़िंदगी कोई हिरासत में गुज़ारा ना करे चाहे मगर उड़ना परी-गुड़िया फ़लक में जा कहीं मौका न दे कहने, हवाओं सी चलूँ, आज़ाद हूँ है बादलों ने चाँद को पीछे छुपा रक्खा कहीं दिलकश नज़ारे जो छुपे, आँखों क' पीछे रह रहे मैं एक लम्हा माँग लू दीदार का उस हुस्न से तो भूल जाऊँ बस उसे मैं सोचने आज़ाद हूँ आगे निकल जो आब टकरा पत्थरों से हर समय जुर्रत कहाँ है पत्थरों में आब को क़ाबू करे है ज़र्ब देती क्यूँँ परेशानी मुझे जब मैं चलू ख़ा चोट कैसे मान लू चलने यहाँ आज़ाद हूँ खिलते गुलिस्ताँ में कई सारे शजर प्यारे सभी उस अर्श को मिलते कई अंजुम चमकते दिख हसीं पर संग रहने ख़ल्क़ के अपने नहीं हो पास जब कहते दिखे आँसू लिए माँ-बाप बिन आज़ाद हूँ यकसाँ फ़लक इस सम्त से उस सम्त तक, चारो तरफ़ तक़्सीम जब होती ज़मीनो की, बने नक़्शे कई इंसान के हो आँख दो, है हाथ दो, है पैर दो पर साँवले हर रंग को धुत्कारने आज़ाद हूँ है गर मुसाफ़िर के लिए दिल में जगह, ख़ुशक़िस्मती पर है कहीं वो घर जहाँ रहना रहे बद-क़िस्मती ख़ंजर बनी है वो ज़ुबाने कर ख़फ़ा हर एक को वो क़त्ल कर आज़ाद, मैं मरने इधर आज़ाद हूँ शायद रहा है तीरगी में ख़ूफ़िया इक रास्ता करते मसाफ़त वो दिखाई दे दिए बेबाक बन तो 'ज़ैन' तुम इन बेड़ियों में क़ैद रह लो आज फिर कल तुम ख़ुदा की आशनाई में कहो आज़ाद हूँ

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