Kuch Alfaaz

ख़ौफ़ अभी जुड़ा न था सिलसिला-ए-कलाम से हर्फ़ अभी बुझे न थे दहशत-ए-कम-ख़िराम से संग-ए-मलाल के लिए दिल आस्ताँ हुआ न था इक़्लीम-ए-ख़्वाब में कहीं कोई ज़ियाँ हुआ न था निकहत-ए-अब्र-ओ-बाद की मस्ती में डोलते थे घर साफ़ दिखाई देते थे उस की गली के सब शजर गर्द मिसाल-ए-दस्तकें दर पे अभी जमी न थीं रंग-ए-फ़िराक़-ओ-वस्ल की परतें अभी खुली न थीं ऐसे में थी किसे ख़बर जब साअत-ए-माहताब हो यूँँ भी तो है कि और ही नक़्शा-ए-ख़ाक-ओ-आब हो

WhatsAppXTelegram
Create Image