Kuch Alfaaz

बहुत बे-दर्द लम्हा था हमारे दरमियाँ आ कर नहीं पल भर रुका जानाँ न हम दोनों से कुछ पूछा न उस ने कुछ भी बतलाया फ़क़त छू कर हमें गुज़रा लहू में सरसराहट सी ज़बाँ में लड़खड़ाहट सी अता कर के भुला बैठा बहुत बे-दर्द लम्हा था बहुत ही याद आता है

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