Kuch Alfaaz

"बेकार फूल" हम हैं किसी दरख़्त का सब सेे पहला सब सेे बेकार फूल हम ने झेले हैं रौशनी के नाम पर कई अज़ाब हम ने देखा है ख़ुद को इक टहनी से टूटते हुए हम ने देखा है क़िस्मत को रूठते हुए हमें कहाँ नसीब के कोई दुख हमारा देखे और देखे तो कोई क्यूँ ख़ुदारा देखे किसी दिन हमें भी इक लड़की को सौंप दिया जाएगा किसी दिन हम भी मुरझा जाएँगे किसी दिन वो लड़की भी किताब में रख कर हम को भूल जाएगी किसी दिन हम भी सूख जाएँगे

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