बेख़ुदी आधी रात को फिर दीवारें मुझ सेे बोली थीं तस्वीरें मुस्कुराई थीं खिड़की आँखें खोली थी घड़ी ख़ामोशी ओढ़ी थी आईने में दरवाज़ा खुला था ज़ख़्मों से जुगनू निकला था ख़ून से ख़ुशबू फूटी थी चौखट पर चाँदी बिखरी थी ज़ेहन-ओ-दिल में बे-फ़िक्री थी परछाई ने खाल उतारी थी आसेबों ने बाल सँवारे थे बिस्तर पे भी चाँद सितारे थे दुनिया भर के नज़ारे थे अपने पहलू में ख़्वाब थे और वो भी बे-हिसाब थे इक सिगरेट के बुझने तक इक छिपकली के करवट लेने तक
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