Kuch Alfaaz

“बे-वफ़ा से बा-वफ़ा का दिल लगाना ठीक है” बे-वफ़ा से बा-वफ़ा का दिल लगाना ठीक है ये बताओ आग में क्या घी मिलाना ठीक है बे-वफ़ा से बा-वफ़ा का दिल लगाना ठीक है क़र्ज़ में डूबी हुई है ज़िंदगी मेरी नहीं हाथ में रोटी नहीं है आँख में पानी नहीं हर तरफ़ बर्बादियों का सोग है बरपा हुआ रोज़ अकेले रो रहा हूँ राह में बैठा हुआ ऐसे में इस हम-नशीं का मुस्कुराना ठीक है बे-वफ़ा से बा-वफ़ा का दिल लगाना ठीक है ज़िंदगी की हर निशानी रात मैं ने फोड़ दी कल ख़ुदा के हाथ की ज़ंजीर मैं ने तोड़ दी रो रहा था कल मगर वो अश्क भी मेरा न था ख़्वाब देखा था मगर वो ख़्वाब भी मेरा न था तुम बताओ ख़्वाब ऐसे में सजाना ठीक है बे-वफ़ा से बा-वफ़ा का दिल लगाना ठीक है तेरे घर के लोग मेरी चौकसी में बैठते रात दिन चौराहे पे बस ताश ही हैं फेंटते इक तरफ़ आवारा कुत्ते इक तरफ़ है ज़ालिमा डर रहा हूँ बन न जाए आज मेरा सालिमा तुम बताओ रात को छत पर बुलाना ठीक है बे-वफ़ा से बा-वफ़ा का दिल लगाना ठीक है बख़्श दे हम पहले से हैं दर्द के मारे हुए हम भी हैं तेरी तरह भगवान के तारे हुए मोल जो भी हो मोहब्बत का चुका देंगे सनम चीज़ क्या हैं हम तुझे ये भी दिखा देंगे सनम ऐसे सबके सामने उँगली उठाना ठीक है बे-वफ़ा से बा-वफ़ा का दिल लगाना ठीक है

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