Kuch Alfaaz

सिर्फ़ हमारा शहर ही नहीं जला जल गई हमारी रेशमी तहज़ीब भी अब इन ही चिंगारियों से रह रह कर सुलग उठती है कोमल मन में नफ़रत की ज्वाला

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