Kuch Alfaaz

“भूलूँ कैसे” सब सेे कहता हूँ भूल चुका हूँ तुम्हें लेकिन तुम्हारी क़सम “जानाँ” कोशिश आज भी जारी है ये जो तुम्हें किसी और के साथ देख कर भी चुप हूँ ना मुझे पागल मत समझो ये बस मेरी ख़ुद्दारी है कैसे भूल जाऊँ वो चाँद सा चेहरा कैसे भूल जाऊँ अपने दिल पर लगा घाव गहरा कुछ चंद रातें होतीं तो भूलता भी कैसे भूल जाऊँ उस चुड़ैल का 3 साल का पहरा

Hashim Khan
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