Kuch Alfaaz

बीज अंदर है लेकिन मैं बाहर हूँ अपनी ज़मीं से फ़क़त मुश्त दो मुश्त ऊपर ख़ला में उगा हूँ मिरी कोई जड़ ही नहीं है नहीं इल्म तालीफ़ की रौशनी ने हवा और पानी ने किस तरह सींचा नमी कैसे मेरे मसामों में आई जुदाई सही मैं ने कैसे मुक़र्रर जो अज़लों से था बीच का फ़ासला वस्त ना वस्त का मरहला मैं ने कैसे गवारा किया आसमाँ के तले मैं ने धरती पे फैले हुए एक सोंधी सी ख़ुशबू में लिपटे हुए लहलहाते जहानों का ख़ुश्क और बंजर ज़मानों का कैसे नज़ारा किया चंद काँटों की सूई से कौनैन के अपने क़ुतबैन के पेच-ओ-ख़म में वजूद-ओ-अदम में जली और ख़फ़ी सारे अबआ'द की सम्त कैसे इशारा किया मैं ने कैसे ब-यक वक़्त अपनी फ़ना और बक़ा से किनारा किया बीज अंदर है कैसे समझ पाएगा बे-नुमू ओ नुमू-कार दुनिया में मुझ जैसे पौदे ने कैसे गुज़ारा किया

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