Kuch Alfaaz

रगों में दौड़ता फिरता लहू फिर थम गया है हवाएँ तेज़ हैं साँसों की हलचल रुक गई है रीढ़ की हड्डी में च्यूँँटी रेंगती है जिस्म में पूरे हरारत बढ़ गई है ज़ाइक़ा कड़वा कसीला हो गया है कि शायद फिर कोई अपना पराया हो गया है

Aabid Adeeb
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