“बस यही एक सच है” बस यही एक सच है बता दो उसे उस सेे नफ़रत है मुझ को ये जुमला नहीं क्यूँ मुझे फ़िक्र हो उस के मुस्कान की जब उसे मेरी ख़ुशियों की परवा नहीं क्यूँ बताऊॅं उसे याद करता हूँ मैं क्या उसे मैं कभी याद आता नहीं मेरी ख़ातिर किया हो कभी उस ने कुछ एक पल ऐसा भी याद आता नहीं अपनी यादें वो ले जाए या जाँ मेरी एक पल भी जिया मुझ सेे जाता नहीं नाम भी उस का अब तो है चुभता मुझे कोई जा कर उसे क्यूँ बताता नहीं पढ़ता है वो अगर मेरे नज़्मों को तो क्या नज़र मेरा हाल उस को आता नहीं गर नज़र उस को आती है हालत मेरी तो भला लौट कर क्यूँ वो आता नहीं इंतिज़ार अब करूँ क्यूँ भला उस का मैं जब कि अब राह मेरी वो तकता नहीं क्यूँ मुझे फ़िक्र हो उस के मुस्कान की जब उसे मेरी ख़ुशियों की परवा नहीं बस यही एक सच है बता दो उसे
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