Kuch Alfaaz

चीख़ना है मुझे इस ज़मीं पर नहीं आसमाँ में नहीं इन वजूदों की ला में ख़ला में मुझे चीख़ना है अना की अना में मगर किस सज़ा में कि जीवन बिताया है इस कर्बला में मुझे चीख़ना है ख़ला में जहाँ अपनी चीख़ें मैं ख़ुद ही सुनूँ फ़ैसला ख़ुद करूँँ इन वजूदों को क्या मैं जि यूँँ या मरूँ

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