Kuch Alfaaz

चाँद का मुँह उतरा हुआ है आज घंटों आसमान में दूर तक पैदल चला है कोई बादल नहीं दिखा जो थोड़ी दूर तक साथ चले सितारों ने भी अपना अपना झुंड बना लिया है एक झुंड का सितारा दूसरे से बात नहीं कर रहा वो जो पेड़ की शाख थी जिस पे रुककर चाँद थोड़ी देर सुस्ताता था किसी ने काट डाला है उस शाख को चाँद रूआंसा सा हो गया है उसे देख कर लिपट कर रोना चाहता है उस पेड़ से दिलासा देना चाहता है एक चेहरा जो छत की मुंडेर पर आ कर चाँद को ताका करता था आज अभी तक दिखा नहीं चाँद सोच में है क्या हुआ होगा बार बार नजरें उस चेहरे को ढूँढ़ती हुई मुंडेर पर चली जाती हैं हवा में ठंडक बढ़ती जा रही है चाँद ख़ुद में सिकुड़ना चाह रहा है एक बूढ़ा बाबा जो घर के सामने खाट डालकर लेटा रहता था,और गुनगुनाता रहता था विरह के गीत अपनी बिछड़ी हुई बूढ़ी के लिए उस सेे कंबल उधार ले कर थोड़ी देर को सुस्ताना चाहता है चाँद और गुनगुनाना चाहता है वही गीत किसी की याद में

Rajnish
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