चाँद की चाँदनी लगा कर चाँदनी को सीने से सर्द उजली रात की आग़ोश में लिपटा सुकून से सो रहा था चाँद और खिल रहे थे उस के होंठों पे जमाल-ए-चाँदनी के कई फूल मगर वक़्त वक़्त रात की आँचल की आड़ में ये मंज़र देख रहा था हँस रहा था फिर जाने क्यूँँ न भाया उस को चाँद के होंठों का तबस्सुम वो रात की तरन्नुम सो छीन ली उस ने चाँद से चाँदनी और चला गया दूर कहीं वक़्त के हाँथों की कठपुतली ये रात भी बेबस थी सो चुप-चाप देखती रही फिर गया चाँद वक़्त के पास माँगने अपनी चाँदनी मगर वो वक़्त अब बीत चुका था वो बदल चुका था अब वो कोई और था और पास उस के नहीं थी चाँद की चाँदनी अब ढूँढ़ता है कहकशाँ की राहों में चाँद न सिर्फ़ एक रौशनी बल्कि अपनी चाँदनी और उस की इक नज़र
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