रह-ए-इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ जुनूँ सा कोई रहनुमा चाहता हूँ जो इरफ़ान की ज़िंदगी को बढ़ा दे मैं वो बादा-ए-जाँ-फ़ज़ा चाहता हूँ मिटा कर मुझे आई मैं जज़्ब कर ले बक़ा के लिए मैं फ़ना चाहता हूँ बयाँ हाल-ए-दिल मैं करूँँ क्यूँँ ज़बाँ से कोई जानता है मैं क्या चाहता हूँ मुझे क्या ज़रूरत है क्या तुम से माँगूँ मगर मैं तुम्हारा भला चाहता हूँ मिरे चारा-गर मैं हूँ बीमार तेरा तिरे हाथ ही शिफ़ा चाहता हूँ
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