Kuch Alfaaz

"हिज्र" चलो तुम छोड़कर जाओ यहाँ से ज़रा देखूँ कोई आया वहाँ से यही है आख़िरी पैग़ाम उस का किसी क़ीमत न मंज़िल से मैं भटकूँ तमन्ना साथ का करते हैं रब से मुझे रस्ता दिखाओ ना तुम मौला महक उस इत्र का अब तक न भूला लगा जो सामने आई थी मेरी मुझे बोला कि सुन ले ऐ मुसाफ़िर मिरा दिल साथ ले जाओगे क्या तुम लबों से यूँँ तो वो कुछ भी न बोली दिलों का खेल मानो चल रहा था दिलों के पास ही ख़ंजर छुपा था हाँ पागल था न मुझ को क्या पता था समय आया जहाँ रस्ता अलग था मिरा कमरा था उस का तो महल था मिटा के फ़ासले कैसे बनाता बता 'रंजन' उसे दुल्हन बनाता

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