चलती रहती है दाएँ बाएँ आगे पीछे साथ साथ धीरे धीरे या तेज़ क़दमों से जैसे ख़िराम करती है हवा बे-पनाह रातों में काँटों और झाड़ियों में बे-ख़बरी के नक़्शों में चलती रहती है कोई बे-मा'नी गुफ़्तुगू उम्र गुज़ारने के लिए दूरियों के दरमियान हिज्र-ओ-विसाल के कोहरे में यख़-बस्ता ख़ामोश रस्तों में चलती रहती है कुछ देर तक कोई ना-क़ाबिल-ए-फ़हम चाल अपने ख़िलाफ़ आज़ुर्दा वुसअ'तों की बिसात पर अज़ल और अबद की बे-मा'नी हमेश्गी में जीने की जुस्तुजू में मरने की आरज़ू में
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