Kuch Alfaaz

आ गई है रुत-बहार सब्ज़ पत्ते सब्ज़ तितली सब्ज़ मंज़र इंतिज़ार इत्र-आगीं हैं हवाएँ पेड़ की गर्दन पे हँसता है तिरी यादों का हार एक साया पेड़ पर चढ़ता हुआ इक सितारा बादलों के आर-पार चाँद दरिया पार कर के आ रहा है तुम से मिलने बे-क़रार शश-जिहत पर ख़ुशबुओं की भीड़ सी बंद रखना तुम न अपने घर के द्वार

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