"चाँद कोई अफ़्साना नहीं" अब तो इल्म की परवाज़ें और ही क़िस्से कहती हैं बाजी अब तो मत बोलो चाँद में परियाँ रहती हैं चाँद न अपना मामूँ है और न देस वो परियों का चाँद में कोई बुढ़िया है और न बुढ़िया का चरख़ा सदियों सदियों खोज के बा'द अब हम ने ये जाना है चाँद कोई अफ़्साना नहीं एक हक़ीक़ी दुनिया है सर्दी गर्मी दोनों तेज़ ऑक्सीजन का नाम नहीं चट्टानें हैं खाइयाँ हैं धरती सा आराम नहीं हो जाएगा पर इक रोज़ जी लेना आसान वहाँ अपने जीने का सामाँ कर लेगा इंसान वहाँ इल्म-ओ-हुनर की धाराएँ पीछे को कब बहती हैं बाजी अब तो मत बोलो चाँद में परियाँ रहती हैं
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