Kuch Alfaaz

"चारा-गर" मिले हैं सारे ही ग़म उसी से उसी की यादें सता रही हैं अभी भी उस के ही रतजगे हैं उसी की ख़ुशबू बुला रही है मैं थक गया हूँ भटक भटक के जिधर भी जाऊँ उसी का चेहरा मैं पागलों की तरह भटकता हुआ मुसाफ़िर, कहाँ रुकूँगा किसे कहूँगा मैं हाल दिल का कोई सुनेगा समझ सकेगा समझ सके तो मैं ये बताऊँ उसी के हाथों मैं मर रहा हूँ, कहा था जिस ने ख़याल रखना

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