बचपन से माँ की दी हुई सीख पर चली हूँ मैं आज भी चल रही हूँ और आगे भी चलना चाहती हूँ पर कभी कभी महसूस होता है थकन का एक बोझ अपने दिल और दिमाग़ पर अक्सर ज़ेहन में उठते हैं कई सवाल क्या हासिल होना है मुझे इस राह पर कब तक यूँँ ही चलती रहूँगी अपने चारों जानिब जब देखती हूँ झूट की ऊँची इमारतें तो ख़याल आता है मेरा सच तो सहरा में उड़ती ख़ाक सा है मेरा वजूद यक-ब-यक अनासिर का ढेर लगता है और मैं ख़ुद से ही घबरा जाती हूँ सहम जाती हूँ फिर याद आती है माँ की बचपन में दी हुई सीख सफल वही होते हैं जो सच्चे होते है ये ख़याल आते ही नए जोश में अपने थके बिखरे टूटे बदन को समेट कर ख़ाक से चट्टान की शक्ल इख़्तियार करती हूँ और तय्यार करती हूँ ख़ुद को एक बार फिर झूट की इमारतों से जंग करने के लिए
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