बुलंद बाँग दा'वों की आवाज़ें खोटे सिक्कों की तरह बजती हैं फिर भी छोटे क़द के लोग इन क़द-आवर आवाज़ों को सुनते रहते हैं काग़ज़ के टुकड़ों की अब कोई क़ीमत न रही फिर भी भूकी आँखें उन्हें ढूँढती हैं और नाकाम रहती हैं और बे-रहम हाथ उन्हें जम्अ'' करते रहते हैं छोटे क़द के लोग अपनी आवाज़ खो चुके हैं वो सिर्फ़ देख सकते हैं और सुन सकते हैं
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