Kuch Alfaaz

"चिट्ठी" जब कभी मेरी याद आए हिज्र का लम्हा कट न पाए किसी की बात हो दिन हो या रात हो मेरे महबूब उस घड़ी तुम मुझे फ़ोन ना मिलाना कोई इक पेज उठाना और उस में बताना वो सभी बातें जो मुझे फ़ोन पर सुनाती तुम और फिर कोई रोज़ छुपा देना किसी किताब में मेरी नहीं तो अपने दोस्त के हाथों मुझ तलक भिजवा देना मेरे दिल की बड़ी तमन्ना है कभी मेरे भी नाम से आए कोई चिट्ठी

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