'सिगरेट और मोहब्बत' वो मुझ सेे रोज़ कहती थी ये सिगरेट छोड़ दो ना तुम हमेशा ग़म में रहने कि रिवायत तोड़ दो ना तुम तो मैं हँसकर ये कहता था बड़ी नादान हो पागल कि मेरी ज़ात से तुम भी अभी अंजान हो पागल चलो माना ये आदत है इसे मैं छोड़ सकता हूँ मोहब्बत भी तो आदत है उसे भी छोड़ दूँ क्या मैं मोहब्बत का जो जज़्बा है बहुत वो ख़ास है शायद मुझे हर वक़्त लगता है वो मेरे पास है शायद मोहब्बत रोग ही तो है ये कोई जोग ही तो है जो हर दम ये उदासी है किसी का सोग ही तो है मोहब्बत की रिवायत है ये ग़म पाना इबादत है मैं अपने ज़ख़्म सीता हूँ ग़म ए माज़ी को जीता हूँ ये सिगरेट और ग़म जो हैं ये ज़रिए राब्ते के हैं धुएँ में अक्स है उस का ग़मों में रम्ज़ है उस का उसे जब याद करने में बहुत दुश्वारी होती है तो मैं सिगरेट को पीता हूँ उसे हर साँस जीता हूँ तो अब तुम ही कहो जानाँ मोहब्बत छोड़ दूँ कैसे जो मेरे ग़म की साथी है वो सिगरेट तोड़ दूँ कैसे।
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