Kuch Alfaaz

" कॉफ़ी" शाम की उदासी में एक कप की कॉफ़ी में एक शय जो कॉमन थी वो तुम्हारी यादें थीं यार मेरी काॅफ़ी से जो तुम्हारा रिश्ता था वो तुम्हारे माथे के रंग से भी गहरा था तुम जो चाह लेती तो इन में देख सकती थी दुनिया भर के रंगों को नीले क्या, गुलाबी क्या, काग़ज़ी और प्याज़ी भी मूँगिया सफ़ेदी भी अब तुम्हें पता भी है रंग मेरी काॅफ़ी का शरबती या शराबी है बा'द तेरे कॉफ़ी की शीशी तोड़ दी हम ने कॉफ़ी छोड़ दी हम ने

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