Kuch Alfaaz

मक़्सद की आँख का नूर आख़िर हमारी निय्यतों में ही चमकता है मुंजमिद होने के डर से मुझे आने वाले मेहमानों का इंतिज़ार ज़ियादा करना होगा मेरी हलावत मेरी रगों में मचल रही है एक मिठास भरी घुलावट जो हलक़ पर लज़्ज़त की दस्तक देती है मैं फ्रीज में पड़ी अपनी करवटों में इतरा रही हूँ जिस के नुक़ूश बिलोरीं बोतल पर रक़्स करते हैं आने वालों का इंतिज़ार लम्बा हो रहा है मेरी रगों में बुरूदत जम रही है ख़ाली होने का शौक़ बड़ा ज़ालिम होता है मगर ये क्या ये आवाज़ कैसी आज मेहमान नहीं आ रहे क्या मेरी मुराद और मेरा शे'र बाक़ी रहेगा

Uzma Naqvi
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