Kuch Alfaaz

फ़साना-ए-ग़म-ए-दिल अब नहीं सुने जाते शब-ए-फ़िराक़ में तारे नहीं गिने जाते दिल-ओ-जिगर में है इक दर्द कहकशाँ की तरह ग़लत जगह कभी अफ़्शाँ नहीं चुने जाते लगी है चोट मुसलसल कुछ इस तरह दिल में कि हम से दाग़-ए-जिगर भी नहीं गिने जाते असर हो जिस का वही शे'र शे'र है 'नाशाद' हर एक शे'र पे सर भी नहीं धुने जाते

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