Kuch Alfaaz

“डर” बस यही सोच कर मैं डर रहा हूँ अगर कहूँ मैं कि प्यार है तुम सेे तो न जाने फिर क्या जवाब दोगी करोगी रुसवा ज़माने में शायद या फिर कहोगी मुझ को प्रेम रोगी बस यही सोच कर मैं बिखर रहा हूँ मना करोगी तुम तो क्या कहूँगा अपने ही मन में मैं सोचा करूँँगा नहीं करूँँगा अब इश्क़ तुम न ही अब तुम को देखा करूँँगा बस यही सोच कर मैं मर रहा हूँ की जीवन अब कैसे कटेगा मेरा क़रीब में तन्हा सा बिस्तर रखूँगा उसी पे रोया करूँँगा शब भर उसी पे अपनी आख़िरी साँस लूँगा बस यही सोच कर मैं डर रहा हूँ अगर कहो तुम हाँ मोहब्बत है तुम सेे तो मारे ख़ुशी के मैं मर ना जाऊँ तुम्हारी ना से तो मैं मर गया था तुम्हारी हाँ से भी कहीं मर ना जाऊँ

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