"दरख़्त और तुम" वो दरख़्त जो तुम ने लगाए थे अब वो बड़े हो गए है उन पर मीठे मीठे फल भी लगने लगे है बिल्कुल तुम्हारे लहजे की तरह इन दरख़्तों में अक्सर मैं ने तुम्हें पाया है जब जब तुम मुझ सेे मिलने आते थे तो हम ऐसे ही किसी दरख़्त की छाँव के नीचे बैठ जाया करते थे अब जब भी मैं इन दरख़्तों के पास आता हूँ तो मुझे यही महसूस होता है कि तुम मेरे साथ ही हो तुम्हारे जाने के बा'द भी इन दरख़्तों ने मुझे तुम्हारे पास ही रखा है इन दरख़्तों का एहसान मैं पूरी उम्र नहीं उतार सकता मैं अब यही चाहता हूँ कि इन दरख़्तों को मेरी भी उम्र लग जाए क्योंकि अगर मेरे बा'द कोई मेरे जैसा ही उदासी भरा इंसान इन्हें मिले तो ये सब मिल कर उस को सम्भाल सकें
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