"दर्द-ए-दिल" ये दर्द-ए-दिल... ये दर्द-ए-दिल मुझे जीने नहीं देता है मेरी माँ कहाँ जाऊँ ? कहाँ जाऊँ जो दर्द-ए-दिल से थोड़ा सा सुकूँ आए मुसलसल मैं सवाली हूँ बताओ ना कहाँ जाऊँ ? ये माज़ी की सभी यादें मेरी उलझन बढ़ाती हैं जो दिल पर ज़ख़्म हैं फ़ुर्क़त के ये उन को दुखाती हैं मैं आहें भरने लगता हूँ मुझे जब याद आता है तेरा नाज़ुक लबों से नर्म लहजे में 'शजर' कहना कभी आँखों की ठंडक तो कभी लख़्त-ए-जिगर कहना तो ये दिल काँप जाता है मुझे जब याद आता है तेरी यादों का दिल के ज़ानू पर सर रख के ये कहना चला जाता है जो भी लौट कर वापस नहीं आता तो आँखें ख़ून रोती हैं मुझे जब याद आता है ये दर्द-ए-दिल मुझे जीने नहीं देता है मेरी माँ कहाँ जाऊँ ? कहाँ जाऊँ जो दर्द-ए-दिल से थोड़ा सा सुकूँ आए मुसलसल मैं सवाली हूँ बताओ ना कहाँ जाऊँ ? ये दर्द-ए-दिल...
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