"दरिया" वो ख़ुशबू और थी जो मुझ को पागल करती थी वो दुनिया और थी मैं जिस में कहीं रहता था वो लड़की एक समुंदर थी मैं जिस की तरफ़ बेसाख़्ता ही दरिया की तरह बहता था वो जा चुकी है यादों का मलबा नहीं जाता ख़ुशियाँ कम ही आती हैं और ग़म कभी नहीं जाता वो मेरे अंदर इस तरह ज़िंदा है "देवांश" मैं कभी-कभी सोचता हूँ मैं मर क्यूँ नहीं जाता
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