Kuch Alfaaz

हालात के काले बादल ने मिरे छत के चाँद को घेर लिया तदबीर हो मुमकिन ख़ाक कोई कि बाहर रक़्साँ तारीकी और अंदर फैली तन्हाई दरवाज़े पर दस्तक दे कर आलाम की वहशत हँसती है और सरगोशी में कहती है कि अब कैसे बच पाओगे मेरी तिश्ना बेबाकी से किस से बातें कर के मुझ को अब तुम धोके में रक्खोगे

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