"दास्तान-ए-ज़िंदगी" तकलीफ बढ़ चली है उम्मीद घट चली है तकदीर सो चली है ये रात रो पड़ी है टूटे पड़े बेसेरे काले हुए सवेरे प्यासे रहे किनारे बुझने लगे सितारे वो ख़्वाब भी गया तब ये दौर है नया अब कोई चराग़ चमके कोई किताब पलटे ख़ाली रही किताबें सूनी पड़ी न जाने ग़म भी झलक रहा है शीशा चटक रहा है टूटा मिला महल भी जो ख़्वाब में चमक रहा है वो ख़्वाब भी गया तब ये दौर है नया अब
Create Image